रूस और लैटिन अमेरिकी देशों से बिजनेस में डॉलर का झंझट खत्म, रुपया भी दौड़ेगा

आरबीआई ने एक्सपोटर्स को रूस और लैटिन अमेरिकी देशों में कई भारतीय बैंकों के जरिये कारोबार करने की मंजूरी दी है. इस फैसले से कानपुर के एक्सपोटर्स खुश हैं, क्योंकि अब उन्हें डॉलर को रुपये में एक्सचेंज करने के लिए माथापच्ची नहीं करनी पड़ेगी. ऐसे ही जब विदेश से डॉलर में पेमेंट होगा तो वह रुपये में आसानी में चेंज हो जाएगा. उनका रुपया एक्सचेंज के चक्कर में कई-कई दिनों तक अटका नहीं रहेगा.

कानपुर: शहर के एक्पोटर्स का प्रदर्शन साल 2021 के मुकाबले साल 2022 में पिछले छह महीने में बहुत शानदार रहा है. आरबीआई के एक फैसले से इन एक्सपोटर्स को अपने कारोबार को और बढ़ाने का मौका मिलेगा. विदेशों में निर्यात करने वाले कारोबारी अब चुनिंदा बैंकों के माध्यम से रूस समेत लैटिन अमेरिकी देशों में अब डॉलर के साथ ही रुपये में भी कारोबार कर सकेंगे (business in Russia and Latin American countries ). डॉलर की बाध्यता खत्म होने के बाद एक्सपोटर्स के लिए ट्रेडिंग आसान अमरीकी डालर के व्यापार हो जाएगी.

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने यूको बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, एचडीएफसी बैंक समेत कई अन्य बैंकों को कारोबार संबंधी गतिविधयों के लिए मंजूरी दे दी है. अब, शहर के निर्यातक उन देशों के साथ भी अपने कारोबार में विस्तार कर सकेंगे, जहां के एक्सपोर्टर्स आसानी से डॉलर में डील नहीं करते हैं. दरअसल अमेरिका ने रूस पर डॉलर में कारोबार करने के लिए प्रतिबंध लगा रखा है. इस वजह से शहर के निर्यातकों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था. अब रुपये में कारोबार होने से निर्यातकों को बहुत राहत मिलेगी.

फेडरेशन आफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गेनाइजेशन (फियो) के सहायक निदेशक आलोक श्रीवास्तव ने बताया कि कानपुर से रूस के साथ सालाना निर्यातकों का कारोबार जहां करीब 500 करोड़ रुपये का है, वहीं लैटिन अमेरिकी देशों के साथ यह कारोबार हजारों करोड़ रुपये का है. अभी तक निर्यातकों को डॉलर में कारोबार करने के लिए अपनी करेंसी को एक्सचेंज करना पड़ता था. बैंकों में इस प्रक्रिया के चलते निर्यातकों का पैसा काफी दिनों तक फंस जाता था. अब रुपये में कारोबार होने से निर्यातकों को फौरन ही अपनी रकम मिल जाएगी.

सीएलई के पूर्व चेयरमैन मुख्तारुल अमीन ने आरबीआई के इस फैसले का स्वागत किया है. उन्होंने कहा कि आरबीआई के इस फैसले से निर्यातकों को निश्चित तौर पर लाभ होगा. यह कदम बहुत सराहनीय . लेदर कारोबारी असद इराकी ने भी कहा कि आरबीआइ के इस निर्णय से सभी निर्यातक अब सुरक्षित ढंग से कारोबार कर सकेंगे.

अमेरिका बना भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार, 2021-22 में द्वपिक्षीय व्यापार 119.42 अरब डॉलर पर

अमेरिका बीते वित्त वर्ष (2021-22) में भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया है। इससे दोनों देशों के बीच मजबूत होते आर्थिक रिश्तों का पता चलता है।

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अमेरिका बीते वित्त वर्ष (2021-22) में भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया है। इससे दोनों देशों के बीच मजबूत होते आर्थिक रिश्तों का पता चलता है। इस तरह भारत के साथ व्यापार के मामले में अमेरिका ने चीन को पीछ़े छोड़ दिया है।अमेरिका बना भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार

वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2021-22 में अमेरिका और भारत का द्वपिक्षीय व्यापार बढ़कर 119.42 अरब डॉलर पर पहुंच गया। 2020-21 में यह आंकड़ा 80.51 अरब डॉलर का था।

आंकड़ों के अनुसार, 2021-22 अमरीकी डालर के व्यापार में भारत का अमेरिका को निर्यात बढ़कर 76.11 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो इससे पिछले वित्त वर्ष में 51.62 अरब डॉलर रहा था। वहीं इस दौरान अमेरिका से भारत का आयात बढ़कर 43.31 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो इससे पिछले वित्त वर्ष में 29 अरब डॉलर था। आंकड़ों के अनुसार, 2021-22 में भारत-चीन द्वपिक्षीय व्यापार 115.42 अरब डॉलर रहा, जो 2020-21 में 86.4 अरब डॉलर था।

वित्त वर्ष के दौरान चीन को भारत का निर्यात मामूली बढ़कर 21.25 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो 2020-21 में 21.18 अरब डॉलर रहा था।

वहीं इस दौरान चीन से भारत का आयात बढ़कर 94.16 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो 2020-21 में 65.21 अरब डॉलर पर था। वित्त वर्ष के दौरान भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा बढ़कर 72.91 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो 2020-21 में 44 अरब डॉलर रहा था।

व्यापार क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी वर्षों में भारत का अमेरिका के साथ द्वपक्षीय व्यापार और बढ़ेगा, जिससे दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को और मजबूती मिलेगी। भारतीय निर्यात संगठनों के महासंघ (फियो) के उपाध्यक्ष खालिद खान ने कहा कि भारत एक भरोसेमंद व्यापार भागीदार के रूप में उभर रहा है और वैश्विक कंपनियां चीन पर अपनी निर्भरता कम कर रही हैं। वैश्विक कंपनियां अपने कारोबार का भारत और अन्य देशों में विविधीकरण कर रही हैं।

खान ने कहा, ‘‘आगामी बरसों में भारत-अमेरिका द्वपिक्षीय व्यापार और बढ़ेगा। भारत, अमेरिका की हिंद-प्रशांत अमरीकी डालर के व्यापार आर्थिक रूपरेखा (आईपीईएफ) पहल में शामिल हुआ है। इससे आर्थिक रिश्तों को और मजबूती मिलेगी।’’भारतीय बागान प्रबंधन संस्थान (आईआईपीएम), बेंगलूर के निदेशक राकेश मोहन जोशी ने कहा कि 1.39 अरब की आबादी के साथ भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के चलते अमेरिका और भारत की कंपनियों के पास प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, विनिर्माण, व्यापार और निवेश के काफी अवसर अमरीकी डालर के व्यापार हैं।

जोशी ने बताया कि भारत द्वारा अमेरिका को मुख्य रूप से पेट्रोलियम उत्पादों, पालिश हीरों, फार्मा उत्पाद, आभूषण, हल्के तेल आदि का निर्यात किया जाता है। वहीं अमेरिका से भारत पेट्रोलियम पदार्थ, तरल प्राकृतिक गैस, सोने, कोयले और बादाम का आयात करता है।

अमेरिका उन कुछ देशों में है जिनके साथ भारत व्यापार अधिशेष की स्थिति में है।

अमेरिका के साथ भारत का व्यापार अधिशेष 32.8 अरब डॉलर का है। 2013-14 से 2107-18 तक और उसके बाद 2020-21 में चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था। चीन से पहले संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था।

अमेरिकी डॉलर को टक्कर देने के लिए मोदी सरकार का मास्टर प्लान, भारत के फैसले से अमेरिका भी हैरान

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हर चुनौती का आगे बढ़कर सामना करते हैं। जब भारतीय रुपये के मुकाबले डॉलर की कीमत आसमान छूने लगी तो प्रधानमंत्री मोदी ने इसे चुनौती के रूप में लेकर भारतीय रुपये को मजबूत करने का फैसला किया। हाल ही में मोदी सरकार की ओर से कुछ ऐसे फैसले लिए गए हैं, जिनसे आने वाले सालों में डॉलर की तुलना में रुपये को मजबूती मिल सकती है। मोदी सरकार अंतर्राष्ट्रीय व्यापार भारतीय रुपये में करने की संभावना तलाश रही है। इसके लिए कई कदम उठाए गए हैं, जिनसे रुपये को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बनाने में मदद मिलेगी।

दरअसल भारत ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार भारतीय रुपये में करने की मुहिम तेज कर दी है। भारत कुछ देशों से लगातार बातचीत भी कर रहा है। इस बीच कुछ अमरीकी डालर के व्यापार देशों ने रुपये में व्यापार करने में सहमति भी जता दी है। श्रीलंकाई बैंकों ने भारतीय रुपये में व्यापार के लिए कथित रूप से स्पेशल वोस्ट्रो रुपी अकाउंट्स या SVRA नामक स्पेशल रुपी ट्रेडिंग अकाउंट खोला है। इसके साथ ही श्रीलंका और भारत के नागरिक एक दूसरे के बीच अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन के लिए अमेरिकी डॉलर की बजाय भारतीय रुपये का इस्तेमाल कर सकते हैं। वहीं भारत के इस कदम और उसे मिल रहे समर्थन से अमेरिका भी हैरान है।

भारत की इस मुहिम में रूस भी शामिल हो सकता है जो कि आने वाले दिनों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए भारतीय रुपये का इस्तेमाल कर सकता है। भारत के साथ रुपये में कारोबार करने के लिए अब कई देश आगे आ सकते हैं। भारत ब्राजील, मैक्सिको, बांग्लादेश, ताजिकिस्तान, क्यूबा, लक्समबर्ग और सूडान अमरीकी डालर के व्यापार समेत कई दूसरे देशों के साथ रुपये में कारोबार करने के अवसर तलाश रहा है। रुपये के अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बनने से भारत का व्यापार घाटा कम होगा और वैश्विक बाजार में इसे मजबूत करने में मदद मिलेगी।

गौरतलब है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए अमेरिकी डॉलर को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है। इससे डॉलर को रुपये के मुकाबले ज्यादा मजबूती मिलती है। इसको देखते हुए भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को रुपये में करने के लिए विदेश व्यापार नीति में बदलाव किया था। इन बदलावों के बाद अब सभी तरह के पेमेंट, बिलिंग और आयात-निर्यात में लेन-देन का निपटारा रुपये में हो सकता है। इस बारे में डायरेक्टोरेट ऑफ अमरीकी डालर के व्यापार फॉरेन ट्रेड यानी DGFT ने एक नोटिफिकेशन भी जारी किया था। ये रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया की तरफ मोदी सरकार का पहला और बड़ा कदम था।

भारतीय रिजर्व बैंक ने इस साल जुलाई में बैंकों को आयात-निर्यात के सौदे रुपये में करने के लिए जरूरी इंतजाम करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद DGFT ने एक अधिसूचना में कहा था कि आरबीआई के 11 जुलाई, 2022 के निर्देश के मुताबिक पैराग्राफ (डी) को अधिसूचित किया गया है, जो रुपये में आयात-निर्यात सौदों के पूरा होने, बिल बनाने और पेमेंट की मंजूरी देता है। इस निर्देश के बाद अब व्यापार सौदों का निपटारा रुपये में भी किया जा सकता है। इसके लिए भारत में अधिकृत डीलर बैंकों को विशेष वोस्ट्रो खाते खोलना अनिवार्य होगा। इस व्यवस्था से आयात का भुगतान भारतीय रुपये में मिल सकेगा।

मोदी सरकार का इरादा साल 2047 तक इंडियन करेंसी को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के तौर पर स्थापित करने की है। इसका उद्देश्य स्पष्ट तौर पर देश को आजाद हुए 100 साल होने पर भारतीय मुद्रा रुपये को दूसरी करेंसियों के बराबर ताकतवर बनाना है। इस बारे में भारत सरकार के तीन महत्वपूर्ण मंत्रालयों यानी वित्त, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने बैठक की थी। इस बैठक में रुपये को ग्लोबल करेंसी के तौर पर स्थापित करने पर गहन चर्चा की गई थी।

अब रुपये में विदेश व्यापार देगा नए अवसर, इस देश को छोड़ किसी ने भारतीय रुपये को नहीं दिया है कानूनी मुद्रा का दर्जा

दुनिया में 85 व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है। दुनिया में 39 कर्ज डॉलर में दिए जाते हैं। कुल डॉलर की संख्या के 65 का इस्तेमाल अमेरिका के बाहर होता है। डॉलर को अंतरराष्ट्रीय व्यापार करंसी कहा जाता है

अब रुपये में विदेश व्यापार देगा नए अवसर, इस देश को छोड़ किसी ने भारतीय रुपये को नहीं दिया है कानूनी मुद्रा का दर्जा

जिम्बाब्वे को छोड़कर किसी अन्य देश ने भारतीय रुपये को कानूनी मुद्रा का दर्जा नहीं दिया है, लेकिन भारत के पड़ोसी देश आपसी समझ के कारण एक दूसरे की मुद्रा को स्वीकार करते हैं। इसमें नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और मालदीव शामिल हैं। भारत ने कुछ मौकों पर ईरान से तेल के लिए रुपये में भुगतान किया है। वहीं कनाडा के साथ भी विशेष अवसरों पर रुपये में कारोबार हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए देसी बैंकों को ढांचागत सुधार करना होगा। उन्हें साइबर सुरक्षा को लेकर बेहद ऊंचे मानदंड अपनाने होंगे।

बैंकों को विदेश में विस्तार का बड़ा मौका मिलेगा

आईआईएफल के उपाध्यक्ष (करंसी एवं कमोडिटी) अनुज गुप्ता ने हिन्दुस्तान को बताया कि रुपये में अंतरराष्ट्रीय बाजार मौजूदा समय में ईरान समेत कुछ चुनिंदा देशों के साथ विशेष शर्तों के साथ होता है। यदि कुछ देशों अमरीकी डालर के व्यापार को भरोसे में लेकर भारत आगे बढ़ता है तो इसके कई फायदे होंगे। इससे रुपये में मजबूती आएगी और कारोबार के नए अवसर बनेंगे। इसके अलावा बैंकों को विदेश में विस्तार का बड़ा मौका मिलेगा जो रोजगार सृजन में मदद करेगा।

दुनिया में 85 व्यापार अमेरिकी डॉलर में

दुनिया में 85 व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है। दुनिया में 39 कर्ज डॉलर में दिए जाते हैं और कुल डॉलर की संख्या के 65 का इस्तेमाल अमेरिका के बाहर होता है। डॉलर को अंतरराष्ट्रीय व्यापार करंसी भी कहा जाता है। इसके बाद यूरो, ब्रिटिश पाउंड, जापानी येन और चीनी यूआन का स्थान है।

महंगाई पर अंकुश लगाने में मददगार

भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का करीब 80 फीसदी आयात करता है और इसके लिए डॉलर में भुगतान करता है। यदि कच्चे तेल के दाम नहीं बढ़ते हैं , लेकिन डॉलर महंगा हो जाता है तो उस स्थिति में भी भारत को महंगा खरीदना पड़ता है।

भारत तेल के तीन बड़े खरीदारों में शामिल है। ऐसे में यदि तेल निर्यातक देशों बात कर वह रुपये में भुगतान स्वीकार करने को सहमत कर ले तो डॉलर महंगा होने के बाद भी उसे तेल के लिए ऊंची कीमत नहीं चुकानी होगी। इससे रिजर्व बैंक और सरकार को देश में महंगाई पर अंकुश लगाने में भी मदद मिलेगी।

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अप्रैल में 40.19 बिलियन अमरीकी डालर तक निर्यात; व्यापार घाटा USD20.11 बिलियन बढ़ा

अप्रैल में 40.19 बिलियन अमरीकी डालर तक निर्यात; व्यापार घाटा USD20.11 बिलियन बढ़ा

वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, अप्रैल में व्यापार घाटा बढ़कर 20.11 अरब डॉलर हो गया, लेकिन भारत का माल निर्यात 30.7 प्रतिशत बढ़कर 40.19 अरब डॉलर हो गया, जो पेट्रोलियम उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक सामानों और रसायनों जैसे क्षेत्रों द्वारा मजबूत प्रदर्शन के लिए धन्यवाद है।

समीक्षाधीन महीने में आयात 30.97 प्रतिशत बढ़कर 60.3 अरब डॉलर हो गया।

अप्रैल 2021 में, व्यापार घाटा 15.29 बिलियन अमरीकी डालर था। "निर्यात ने अप्रैल 2022 में मजबूत वृद्धि जारी रखी, पिछले वित्त वर्ष में रिकॉर्ड प्रदर्शन के बाद, माल निर्यात 40 बिलियन अमरीकी डालर को पार करके एक नया उच्च स्तर स्थापित करने के साथ," इसमें कहा गया है।

इस महीने के दौरान पेट्रोलियम और कच्चे तेल का आयात 87.54 प्रतिशत बढ़कर 20.2 अरब डॉलर हो गया। कोयला, कोक और ब्रिकेट्स का आयात अप्रैल 2021 में बढ़कर 4.93 अरब डॉलर अमरीकी डालर के व्यापार हो गया, जो अप्रैल 2021 में 2 अरब डॉलर था।
दूसरी ओर, सोने का आयात अप्रैल 2021 में 72% से अधिक घटकर 1.72 बिलियन अमरीकी डालर रह गया, जो पिछले महीने 6.23 बिलियन अमरीकी डालर था। इंजीनियरिंग वस्तुओं का निर्यात 15.38 प्रतिशत बढ़कर 9.2 अरब डॉलर हो गया, जबकि पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात 113.21 प्रतिशत बढ़कर 7.73 अरब डॉलर हो गया।

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